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Drought

Drought · types · DPAP · NMSA

12 मिनट में पढ़ें · अपडेट किया गया 2026-06-02

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त्वरित उत्तर

सूखा लंबे समय तक सामान्य से कम वर्षा की वह स्थिति है जिससे लोगों, फ़सलों और पारितंत्रों के लिए जल की कमी हो जाती है। इसे चार वर्गों में बाँटा जाता है: मौसमी, जब वर्षा में कमी हो; जलीय, जब जलाशय व भूजल घटें; कृषि, जब मृदा-नमी फ़सल के लिए अपर्याप्त हो; और सामाजिक-आर्थिक, जब कीमतें, ऋण और पलायन बढ़ें। भारत का लगभग 68% कृषि क्षेत्र सूखा-प्रवण है।

कहानी

अप्रैल 2016। लातूर, मराठवाड़ा, महाराष्ट्र। पारा 45°C पर पहुँच चुका है। मंजरा बाँध — जो लातूर शहर के 5 लाख निवासियों की जीवनरेखा है — आठ महीने से सूखा पड़ा है। नगर-पालिका के नल से पानी की आपूर्ति 75 दिनों से बंद है। लोग रात 3 बजे से रेलवे स्टेशन पर कतार लगाते हैं, जहाँ भारतीय रेलवे की 'जलदूत एक्सप्रेस' 350 किमी दूर मिराज से हर दूसरे दिन 5 लाख लीटर पानी लेकर आती है।

पानी के स्रोतों के पास धारा 144 CrPC लागू है — दंगे रोकने का प्रावधान जल-दंगों की आशंका से। टैंकरों का किराया ₹3,000 प्रति चक्कर है। 45°C की गर्मी में स्कूली बच्चे बेहोश हो रहे हैं। मराठवाड़ा की 80% फसलें नष्ट हो चुकी हैं; उस वर्ष अकेले मराठवाड़ा में 3,200 किसानों ने आत्महत्या की। भारत का चालीस प्रतिशत क्षेत्र घोषित सूखे की चपेट में है।

यह 1972 के बाद भारत का सबसे भीषण सूखे का वर्ष था। इसकी जड़ में थे लगातार दो El Niño-जनित कमज़ोर मानसून (2014, 2015), जिसे भूजल के अत्यधिक दोहन और फसल-प्रतिरूप की असंगति ने और गहरा किया। केंद्र सरकार ने ₹12,000 करोड़ के सूखा-राहत की घोषणा की। मराठवाड़ा, बुंदेलखंड, तेलंगाना, कर्नाटक, तमिलनाडु — सभी बुरी तरह प्रभावित हुए।

इस इकाई में कृषि, मौसम-विज्ञान, जलविज्ञानीय सूखे, उनके वर्गीकरण, ADMI सूचकांक, NDMA के सूखा-दिशानिर्देश, तथा संरचनात्मक कारकों (वर्षा परिवर्तनशीलता, भूजल, फसल प्रतिरूप) का विवरण है।

UPSC के लिए यह क्यों महत्वपूर्ण है

सूखा भारत के 68% कृषि-योग्य क्षेत्र को प्रभावित करता है। Prelims में तीन-प्रकार का वर्गीकरण + IMD-MoA की रूपरेखाएँ पूछी जाती हैं। Mains में संरचनात्मक कारकों और सरकारी हस्तक्षेपों (PMKSY, MGNREGA, फसल बीमा) की चर्चा अपेक्षित है। साक्षात्कार मंडल लातूर 2016 बनाम बुंदेलखंड के दीर्घकालिक सूखे — अर्थात् स्थायित्व की समस्या — पर प्रश्न करते हैं।