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सामाजिक न्यायप्रारंभिक: उच्चमुख्य परीक्षा: उच्चसाक्षात्कार: उच्च12 मिनट में पढ़ेंअपडेट किया गया 2026-06-02

LGBTQ+ rights

LGBTQ+ rights — NALSA 2014, Section 377 striking (Navtej Singh Johar), Transgender Act 2019

कहानी से शुरुआत

6 सितंबर 2018 — भारत के उच्चतम न्यायालय की पाँच-न्यायाधीशों की संविधान पीठ — मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा, न्यायमूर्ति A.M. खानविलकर, Rohinton F. Nariman, D.Y. Chandrachud एवं Indu Malhotra — ने सर्वसम्मति से IPC की धारा 377 को वयस्कों के बीच सहमति से किए गए समलैंगिक यौन संबंध के संदर्भ में असंवैधानिक घोषित कर दिया। न्यायमूर्ति Indu Malhotra ने लिखा: "इतिहास इस समुदाय के सदस्यों और उनके परिवारों से क्षमा माँगने का ऋणी है।" न्यायमूर्ति Chandrachud ने Leonard Cohen को उद्धृत किया: "हर चीज़ में दरार होती है; उसी से रोशनी भीतर आती है।"

Navtej Singh Johar v. UoI एक 20-वर्षीय संघर्ष की परिणति है: Naz Foundation v. NCT (2009) (Delhi HC ने धारा 377 की व्याख्या सीमित की) → Suresh Kumar Kaushal (2013) (SC ने Delhi HC को पलटा) → NALSA v. UoI (2014) ("तीसरे लिंग" को मान्यता) → Justice K.S. Puttaswamy (2017) (निजता का अधिकार + यौन अभिविन्यास पहचान का अंग) → Navtej Singh Johar (2018)

एक वर्ष बाद, 5 दिसंबर 2019 को संसद ने Transgender Persons (Protection of Rights) Act 2019 पारित किया, जिससे NALSA के निर्देश क़ानूनी धरातल पर उतरे और ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को सांविधिक मान्यता मिली। पाँच वर्ष बाद, Supriyo @ Supriya Chakraborty v. UoI (अक्टूबर 2023) में 3-2 के बहुमत से समान-लिंगी विवाह को संवैधानिक मान्यता देने से इनकार किया गया, किंतु सर्वसम्मति से समान-लिंगी जोड़ों के साथ रहने और गरिमा के अधिकार की पुष्टि की गई तथा कल्याण हकदारियों की समीक्षा के लिए Centre को एक उच्च-शक्ति समिति (High-Powered Committee) गठित करने का निर्देश दिया गया।

UPSC GS-II में "LGBTQ+ अधिकार" सबसे तेज़ी से उभरता हुआ Social Justice उप-विषय है — 2014 के बाद से प्रत्येक वर्ष कम-से-कम एक प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष PYQ रहा है। PYQs: 2017 (Naz / Suresh Kumar Kaushal का क्रम), 2018 (धारा 377 + अनुच्छेद 21 निजता), 2020 (NALSA + Transgender Persons Act), 2023 (Supriyo + विवाह समानता)।

UPSC के लिए यह क्यों महत्वपूर्ण है

भारत में ट्रांसजेंडर जनसंख्या Census 2011 के अनुसार 4.88 लाख अनुमानित है — WHO एवं सामुदायिक सर्वेक्षणों के अनुसार वास्तविक संख्या जनसंख्या के 2-3% (~3 करोड़) तक हो सकती है। Mainichi LGBT-Indian Survey 2020 के अनुसार भारत में LGBTQ+ जनसंख्या ~10 करोड़ आँकी गई है।

GS-II PYQs में 2014, 2017, 2018, 2020, 2022, 2023, 2024 — 10 वर्षों में 7 बार LGBTQ+ अधिकारों पर प्रश्न पूछे गए हैं, जो किसी भी उप-विषय के लिए सर्वाधिक घनत्व में से एक है।

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