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वैकल्पिक विषय — अर्थशास्त्रप्रारंभिक: कममुख्य परीक्षा: उच्चसाक्षात्कार: मध्यम60 मिनट में पढ़ेंअपडेट किया गया 2026-06-02

Paper II

Paper II — Indian Economy after Independence — planning, mixed economy

कहानी से शुरुआत

15 मार्च 1950 की शाम को, योजना भवन के ऊँची छत वाले सम्मेलन कक्ष में, जवाहरलाल नेहरू ने भारत के Planning Commission की स्थापना करने वाले कैबिनेट प्रस्ताव संख्या 1-P(C)/50 पर हस्ताक्षर किए। मेज के चारों ओर बैठे थे C.D. देशमुख (वित्त मंत्री एवं पूर्व RBI गवर्नर), G.L. मेहता (उद्योगपति), T.T. कृष्णमाचारी (उद्योग मंत्री), और एक युवा सांख्यिकीविद् P.C. महालनोबिस — जो अभी तक सदस्य-सूची में नहीं थे, किंतु शीघ्र ही भारतीय आर्थिक चिंतन की दिशा को पूरी तरह बदल देने वाले थे। इस आयोग की स्थापना के लिए कोई संवैधानिक प्रावधान नहीं था — यह कार्यकारी प्रस्ताव द्वारा बना था। संसद में कोई बहस नहीं हुई। फिर भी अगले 64 वर्षों तक, जब तक मोदी सरकार ने 13 अगस्त 2014 को इसे भंग नहीं किया, इसी निकाय ने भारतीय अर्थव्यवस्था का मूल青चित्र लिखा।

पहला कार्य अत्यंत जरूरी था। स्वतंत्रता के साथ भारत को विरासत में मिला था — 619 डॉलर (1990 मूल्यों में) प्रति व्यक्ति आय, 16.7% साक्षरता दर, 32 वर्ष जीवन-प्रत्याशा, केवल ₹830 करोड़ विदेशी मुद्रा भंडार (ब्रिटेन पर देय £1.1 अरब स्टर्लिंग संतुलन के मुकाबले), लाखों विभाजन-पीड़ित शरणार्थी, और एक औद्योगिक आधार जो विश्व के निर्मित वस्तुओं का 2% से कम उत्पन्न करता था। अंग्रेज एक रेलवे नेटवर्क, डाक सेवा, नागरिक सेवा छोड़ गए थे — किंतु न कोई एकीकृत कृषि ऋण प्रणाली, न कोई घरेलू पूँजीगत वस्तु उद्योग, और न ऐसा कोई विश्वविद्यालय जो अभियांत्रिकी में मुट्ठी भर से अधिक PhDs देता हो।

1951 में भारत ने जो विकल्प चुना — सोवियत प्रभाव से प्रेरित मिश्रित अर्थव्यवस्था के माध्यम से नियोजित औद्योगीकरण — वह उस समय भी विवादास्पद था और आज भी विवाद का विषय बना हुआ है। बॉम्बे प्लान (1944) एक निजी क्षेत्र-नेतृत्व वाली औद्योगिक दृष्टि प्रस्तुत कर चुका था। गांधीवादी योजना (S.N. अग्रवाल, 1944) ने विकेंद्रीकृत ग्राम उद्योग की वकालत की थी। B.R. शेनॉय ने द्वितीय पंचवर्षीय योजना (1956) पर अपने एकमात्र असहमति-पत्र में चेतावनी दी थी कि महालनोबिस की भारी उद्योग रणनीति अर्थव्यवस्था को स्थायी अकुशलता में धकेलेगी। नेहरू ने अलग चुनाव किया। यह अध्याय उसी चुनाव की कहानी है — उसके 40 वर्षों के चाप की, और उस लंबी छाया की जो वह भारतीय आर्थिक नीति पर आज भी डालता है।

14 अगस्त 1947 की आधी रात से ठीक तीन मिनट पहले, संसद के केंद्रीय कक्ष में नेहरू ने "नियति से वादा" (Tryst with Destiny) भाषण दिया: "जब मध्यरात्रि का घंटा बजेगा, जब सारी दुनिया सोयेगी, भारत जीवन और स्वतंत्रता की ओर जागेगा।" उन्होंने "गरीबी, अज्ञान, रोग और अवसर की असमानता" — चार शत्रुओं का नाम लिया। इन चारों से लड़ने के लिए चार अलग-अलग नीतिगत उपकरण थे: गरीबी के लिए विकास, अज्ञान के लिए साक्षरता अभियान, रोग के लिए प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (भोर समिति 1946), और असमानता के लिए पुनर्वितरण (भूमि सुधार, MRTP, प्रगतिशील कराधान)। Planning Commission इसी वाग्मिता और क्रियान्वयन के बीच की संस्थागत कड़ी था।

चौवालीस वर्ष बाद, 24 जुलाई 1991 को लोकसभा में एक और भारतीय प्रधानमंत्री आर्थिक संकट से निपटने के लिए खड़े हुए। नरसिम्हा राव सरकार के नए वित्त मंत्री मनमोहन सिंह ने विक्टर ह्यूगो के शब्दों से अपना बजट भाषण आरंभ किया: "दुनिया की कोई ताकत उस विचार को नहीं रोक सकती जिसका समय आ गया हो।" उस समय भारत का विदेशी मुद्रा भंडार केवल 1.2 अरब डॉलर था — बमुश्किल दो हफ्ते के आयात के बराबर। Reserve Bank इंग्लैंड के बैंक को 67 टन सोना गिरवी रख चुका था (बाद में UBS ज्यूरिख को 47 टन और)। उसी भाषण के चंद घंटों में 1 जुलाई को रुपये का 9% अवमूल्यन और 3 जुलाई को 11% अवमूल्यन हो गया। अगले सप्ताह 18 उद्योगों को छोड़कर सभी के लिए औद्योगिक लाइसेंसिंग समाप्त हो गई। उसके अगले सप्ताह MRTP के पूर्व-प्रवेश अनुमोदन समाप्त किए गए। एक महीने के भीतर 34 उच्च-प्राथमिकता उद्योगों में स्वचालित मार्ग से 51% तक FDI खुल गई। नियोजन युग औपचारिक रूप से समाप्त नहीं हुआ — आठवीं योजना (1992-97) जारी रही — लेकिन उसकी आत्मा पहले ही इतिहास बन चुकी थी

यह अध्याय 1947 से 2025 तक के 80-वर्षीय चाप का अनुसरण करता है — कैबिनेट प्रस्ताव 1-P से NITI Aayog के विजन 2047 तक, PL-480 की जहाज-से-मुँह तक निर्भरता से GDP-PPP के आधार पर विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था तक, हिंदू दर 3.5% से 2003 के बाद 7%+ की गति तक।

UPSC के लिए यह क्यों महत्वपूर्ण है

यह अध्याय UPSC Economics Optional Paper II के लिए केंद्रीय महत्व का है, जो प्रति वर्ष 10-अंक और 15-अंक के प्रश्नों में 20-30 अंक देता है। 2014-2024 के प्रश्नपत्रों से पता चलता है कि परीक्षक निम्न विषयों को विशेष तरजीह देते हैं: (क) महालनोबिस मॉडल और उसकी आलोचना (भगवती-क्रूगर, वकील-ब्रह्मानंद); (ख) मिश्रित अर्थव्यवस्था एक विशिष्ट विकास मॉडल के रूप में; (ग) कृषि बनाम उद्योग, उपभोग बनाम निवेश जैसे व्यापार-बंद विवाद; और (घ) नियोजन से उदारीकरण की संक्रमण प्रक्रिया। साक्षात्कार बोर्ड अक्सर पूछते हैं कि नेहरूवादी मॉडल "उस समय जरूरी था लेकिन अब गलत है या नहीं।" इस अध्याय में महारत से आप 1947 के बाद की किसी भी नीतिगत थीम पर 250 शब्दों का उत्तर लिख सकते हैं।

अंकों की गणना से परे, यह अध्याय अभ्यर्थी को लगभग हर Paper II प्रश्न के लिए बौद्धिक ढाँचा प्रदान करता है। उद्योग अध्याय (LPG, MRTP, FERA→FEMA) नियोजन संदर्भ के बिना अबूझ है। कृषि अध्याय (हरित क्रांति, MSP, कृषि ऋण) नियोजन-युग की परियोजना था। विदेश व्यापार अध्याय (आयात प्रतिस्थापन, निर्यात निराशावाद, भगवती-क्रूगर) नियोजन आलोचना की उप-बहस है। व्यापक आर्थिकी अध्याय (महालनोबिस की बचत-निवेश पहचान, छठी योजना में घाटे की वित्त व्यवस्था, FRBM) नियोजन की शब्दावली को विरासत में लेता है। मुद्रा एवं बैंकिंग अध्याय (बैंक राष्ट्रीयकरण 1969, RBI की प्राथमिकता क्षेत्र उधारी, नरसिम्हन समितियाँ) नियोजन युग के वित्तीय दमन की उपज है। नियोजन अध्याय छोड़ना Paper II के बाकी भाग को अनुवाद में पढ़ने जैसा है।

GS Paper III के अभ्यर्थी के लिए भी यह अध्याय नियोजन, संसाधन जुटाना, विकास और समावेशी विकास के 'भारतीय अर्थव्यवस्था' पाठ्यक्रम का प्रवेश द्वार है। Economics Optional न लेने वाले अभ्यर्थियों को भी यहाँ के अनुभवजन्य आधार-स्तंभ — हिंदू दर, IPR 1956 सूचियाँ, नियोजन बनाम NITI Aayog संरचना, 14वें FC का 32% से 42% तक विचलन — अवश्य जानने चाहिए।

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