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भारतीय राजव्यवस्था एवं संविधानप्रारंभिक: उच्चमुख्य परीक्षा: उच्चसाक्षात्कार: उच्च11 मिनट में पढ़ेंअपडेट किया गया 2026-06-01

Constitutional Amendments

Constitutional Amendments · process · basic structure · Kesavananda

कहानी से शुरुआत

तारीख है 24 अप्रैल 1973, मंगलवार की सुबह, भारत के सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) के कोर्ट नंबर 1 में। मुख्य न्यायाधीश S.M. Sikri न्यायालय के इतिहास की सबसे बड़ी पीठ की अध्यक्षता कर रहे हैं — 13 न्यायाधीश — एक ऐसी पीठ जिसका आकार अगले 47 वर्षों तक कभी नहीं छुआ जाएगा। पाँच महीनों में 68 दिनों तक इस पीठ ने एक ही प्रश्न पर दलीलें सुनी हैं: क्या संसद संविधान के किसी भी भाग को अपनी मर्ज़ी से संशोधित कर सकती है?

मामला है Kesavananda Bharati Sripadagalvaru v. State of Kerala। याचिकाकर्ता एक हिन्दू संन्यासी हैं, केरल के Edneer Mutt के प्रमुख, जो केरल सरकार के भू-सीमा (land-ceiling) कानूनों को चुनौती दे रहे हैं। वास्तविक कानूनी मुद्दा कहीं अधिक बड़ा है: पिछले वर्ष संसद ने संविधान संशोधनों की न्यायिक समीक्षा में सर्वोच्च न्यायालय की भूमिका सीमित करने के लिए 24वाँ, 25वाँ और 29वाँ संविधान संशोधन पारित किए थे। 24वें ने स्पष्ट रूप से यह स्पष्ट किया था कि संसद की संशोधन शक्ति असीमित है; 25वें ने Article 31C बनाया था जो Article 39(b)/(c) DPSPs को प्रभावी करने वाले कानूनों को Articles 14, 19, 31 से उन्मुक्ति (immunity) देता था; 29वें ने केरल के भूमि सुधारों को Ninth Schedule में डाला था।

मुख्य न्यायाधीश Sikri निर्णय का सारांश पढ़ते हैं। 7 न्यायाधीश बहुमत की राय पर हस्ताक्षर करते हैं; 6 असहमति (dissent) में हैं। निष्कर्ष: "Article 368 के अंतर्गत संविधान को संशोधित करने की शक्ति संसद को संविधान के मूल ढाँचे (basic structure) या स्वरूप को बदलने का अधिकार नहीं देती।" न्यायालय यह विस्तृत रूप से सूचीबद्ध नहीं करता कि मूल ढाँचा क्या है — जानबूझकर ऐसा करता है। प्रत्येक न्यायाधीश अलग-अलग विशेषताओं का उल्लेख करते हैं। परन्तु संवैधानिक मूल नियम बदल गया है: अब संवैधानिक प्रावधानों की एक ऐसी श्रेणी मौजूद है जिसे संसद के विशेष बहुमत द्वारा भी नहीं छुआ जा सकता।

बावन वर्ष बाद, मूल ढाँचा सिद्धांत (basic structure doctrine) ने हर बड़े संवैधानिक विवाद को आकार दिया है। NJAC फैसला 2015 (मूल ढाँचे ने न्यायिक स्वतंत्रता की रक्षा की), Article 370 का निरसन 2023 में बरकरार (मूल ढाँचे की बहस पुनः उठी), Tamil Nadu Governor फैसला 2025 (संघवाद के मूल ढाँचे के निहितार्थ)। UPSC के लिए यह विषय हर साल परखा जाता है — Prelims के तथ्यों के रूप में भी और Mains-स्तरीय वैचारिक बहसों के रूप में भी।

UPSC के लिए यह क्यों महत्वपूर्ण है

संविधान संशोधन और मूल ढाँचा मिलकर उस प्रश्न को परखते हैं जो सभी लिखित संविधानों को परिभाषित करता है: एक संविधान स्वयं बने रहते हुए कैसे बदलता है?

UPSC के लिए यह विषय इस प्रकार परखा जाता है:

Prelims: Article 368, संशोधन प्रक्रियाओं के तीन प्रकार, नामित संशोधन (1st, 24th, 42nd, 44th, 73rd-74th, 86th, 91st, 93rd, 101st, 104th, 105th, 106th), मामलों के नाम (Champakam → Golak Nath → Kesavananda → Minerva Mills → Bommai → NJAC)।

Mains GS-II: संविधान संशोधन की प्रक्रिया, मूल ढाँचा सिद्धांत का विकास, FRs और DPSPs के बीच टकराव, संसदीय सर्वोच्चता बनाम संवैधानिक सर्वोच्चता की बहस।

Interview: इस पर खुले-अंत वाले प्रश्न कि क्या मूल ढाँचा लोकतंत्र को सीमित करता है, क्या न्यायालय मूल ढाँचे की पहचान कर सकते हैं, क्या विशिष्ट हालिया संशोधन उसका सम्मान करते हैं।

यह फ़ाइल Article 368 की कार्यप्रणाली, संशोधन की तीन श्रेणियों, Kesavananda मामला + बाद के मामलों के माध्यम से पहचानी गई 13 मूल ढाँचा विशेषताओं, संख्या के अनुसार प्रमुख संशोधनों, और समकालीन बहस को कवर करती है।

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