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भारतीय समाजप्रारंभिक: उच्चमुख्य परीक्षा: उच्चसाक्षात्कार: उच्च12 मिनट में पढ़ेंअपडेट किया गया 2026-06-02

Transgender community

Transgender community · NALSA case · 2019 Act

कहानी से शुरुआत

15 अप्रैल 2014भारत के सर्वोच्च न्यायालय में न्यायमूर्तियों K.S. Radhakrishnan और A.K. Sikri की दो-न्यायाधीश पीठ एक ऐसा ऐतिहासिक निर्णय सुनाती है जो 120 पृष्ठों और असाधारण नैतिक बल से भरे 130 अनुच्छेदों में लिखा गया है। यह मामला है National Legal Services Authority (NALSA) v. Union of India — जिसे 2012 में NALSA ने किन्नर समुदाय (हिजड़े, कोथि, अरवानी, जोगता, शिव-शक्ति, डबल-डेकर, तथा स्वयं-पहचान रखने वाले ट्रांसमेन + ट्रांसवुमेन) की ओर से दायर किया था — जो ऐतिहासिक रूप से भारत का सर्वाधिक हाशिये पर रखा गया समूह है।

न्यायालय का निर्णय:

"अपनी लैंगिक पहचान को स्वीकृति मिलना मानवीय गरिमा के मूल अधिकार के केंद्र में है। लिंग (Gender), जैसा पहले से इंगित किया गया है, व्यक्ति की आत्म-छवि, यौन पहचान और चरित्र की गहरी मनोवैज्ञानिक या भावनात्मक अनुभूति को दर्शाता है।"

न्यायालय ने स्थापित किया:

  1. किन्नर व्यक्ति समस्त कानूनों के प्रयोजन से "तृतीय लिंग" (Third Gender) हैं।
  2. लैंगिक पहचान के स्व-निर्धारण का अधिकार Article 21 के अंतर्गत मानवीय गरिमा का अभिन्न अंग है।
  3. किन्नर व्यक्तियों को सामाजिक + शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्ग के रूप में माना जाए और उन्हें OBC आरक्षण दिया जाए।
  4. Article 14 (समानता) + Article 15 (भेदभाव से सुरक्षा) + Article 16 (अवसर की समानता) + Article 19 (अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) — ये सभी किन्नर व्यक्तियों पर लागू होते हैं।

इस निर्णय में Yogyakarta Principles 2007 का उल्लेख है; हिजड़ा-अरवानी-कोथि सांस्कृतिक परंपराओं जैसे अर्धनारीश्वर और मुगलकालीन दरबारी पदों का संदर्भ है; और राज्य को कल्याण बोर्ड + छात्रवृत्ति + HIV कार्यक्रम स्थापित करने के आदेश दिए गए हैं।

पाँच वर्ष बाद (5 दिसंबर 2019), संसद ने Transgender Persons (Protection of Rights) Act 2019 पारित किया — परंतु इसने विवादास्पद रूप से NALSA के "स्व-पहचान" सिद्धांत को जिला मजिस्ट्रेट प्रमाणीकरण की अनिवार्यता से कमज़ोर कर दिया। समुदाय ने विरोध किया; मुकदमेबाज़ी जारी है। 2024 में, SC ने पासपोर्ट + सरकारी प्रपत्रों में M/F/T त्रिभाज से परे non-binary पहचान की अनुमति दी। यह पाठ उसी यात्रा का मानचित्र प्रस्तुत करता है।

UPSC के लिए यह क्यों महत्वपूर्ण है

Mains GS-I2017 में प्रश्न पूछा गया: "पितृसत्ता (Patriarchy) भारत में मध्यवर्गीय कामकाजी महिला की स्थिति को कैसे प्रभावित करती है?" — और परोक्ष रूप से महिला सशक्तीकरण + लैंगिक न्याय के अंतर्गत बार-बार पूछा जाता है। GS-II में 2019 में सामाजिक रूप से हाशिये पर रहे समूहों के अधिकारों पर, तथा 2021 में NALSA-प्रकार के न्यायिक हस्तक्षेपों पर प्रश्न आए।

Prelims में परीक्षित विषय:

  • NALSA case (वर्ष + पीठ + निर्णय बिंदु)।
  • 2019 Act + 2020 Rules।
  • Census 2011 में TG की जनसंख्या (~4.88 लाख)।
  • National Council for Transgender Persons (संरचना)।
  • Navtej Singh Johar 2018 (Section 377 की व्याख्या)।
  • Supriyo Chakraborty 2023 (विवाह समानता)।
  • SMILE Scheme (Support for Marginalised Individuals for Livelihood + Enterprise) 2022।

Interview: NALSA का स्व-पहचान सिद्धांत बनाम 2019 Act का प्रमाणीकरण विवाद; सामाजिक अधिकारों में SC की भूमिका; विवाह समानता के साथ अंतर्संबंध; हिजड़ा सांस्कृतिक विरासत।

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