Anti-defection law
Anti-defection law · Schedule X · Speaker's powers
कहानी से शुरुआत
समय है मार्च 1967, स्थान हरियाणा। राज्य विधानसभा ने अभी-अभी अपने नए MLAs चुने हैं। हसनपुर निर्वाचन क्षेत्र के Gaya Lal उनमें से एक हैं। केवल 15 दिनों के भीतर वे तीन बार अपनी पार्टी बदलते हैं — Congress से United Front, फिर वापस Congress, और अंत में दोबारा United Front। K.M. Mathew नामक एक वरिष्ठ पत्रकार वह मुहावरा गढ़ते हैं जो भारतीय राजनीतिक लोककथा बन जाता है: "Aaya Ram, Gaya Ram" — राम आया, राम गया। Gaya Lal के नाम और "जाने" के संस्कृत क्रिया पर यह श्लेष कुछ बड़ी बात पकड़ता है: 1967-71 की अवधि में 17 राज्यों में 142 MLAs ने दलबदल किया। उन चार वर्षों में 32 राज्य सरकारें बनीं और गिरीं।
1970 के दशक में संवैधानिक सुधार के बार-बार प्रयास हुए — PV Narasimha Rao ने 1985 में 52वां संवैधानिक संशोधन प्रस्तावित किया, Rajiv Gandhi सरकार ने इसे पारित किया, और भारत को पहली बार अपना दलबदल विरोधी कानून (Tenth Schedule) मिला। इस कानून ने उन MPs और MLAs को निरर्ह (disqualify) कर दिया जो स्वेच्छा से पार्टी सदस्यता छोड़ देते थे या बिना अनुमति पार्टी व्हिप की अवहेलना करते थे। इसमें एक महत्वपूर्ण अपवाद था: किसी विधायी दल के कम से कम एक-तिहाई के "split" (विभाजन) को संरक्षण प्राप्त था।
इस split अपवाद का दुरुपयोग हुआ। तीन छोटे टूटे हुए गुट मिलकर = एक-तिहाई = वैध "split"। जो राजनेता पार्टी बदलना चाहते थे, वे "split" का दावा करने के लिए बस पर्याप्त सहयोगियों को जुटा लेते थे। 1985 का कानून दलबदल रोकने में विफल रहा; इसने केवल दलबदल को अधिक संगठित बना दिया।
2003 में, 91वें संवैधानिक संशोधन ने split अपवाद को हटा दिया। अब केवल किसी विधायी दल के दो-तिहाई का दूसरी पार्टी के साथ merger (विलय) ही संरक्षित है। यही आज का दलबदल विरोधी कानून है — हर राजनीतिक संकट में इस पर बहस होती है (Karnataka 2018, Maharashtra 2019 + 2022, Madhya Pradesh 2020, Goa 2022, Telangana 2024), हर UPSC Mains GS-II पेपर में इसकी परीक्षा होती है, और इसमें सुधार की बार-बार माँग उठती है।
UPSC के लिए यह क्यों महत्वपूर्ण है
दलबदल विरोधी कानून तीन संवैधानिक तनावों के केंद्र में बैठा है:
पार्टी अनुशासन बनाम MP की स्वायत्तता — क्या निर्वाचित MP मतदाताओं का प्रतिनिधित्व करता है या पार्टी का?
Speaker की निष्पक्षता बनाम पक्षपातपूर्ण कब्जा — Speaker, जो प्रायः सत्तारूढ़ दल से होता है, निरर्हता के मामलों का निर्णय करता है।
स्थिरता बनाम लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व — क्या दलबदल विरोधी कानून वैध राजनीतिक अभिव्यक्ति की कीमत पर सरकार की स्थिरता की रक्षा करता है?
UPSC के लिए:
Prelims: Tenth Schedule के प्रावधान, 52वाँ संशोधन 1985, 91वाँ संशोधन 2003, Kihoto Hollohan v. Zachilhu 1992, Speaker की भूमिका, अपवाद (merger), हाल के संकट के मामले।
Mains GS-II: दलबदल विरोधी कानून की प्रभावशीलता, Speaker का पक्षपात, सुधार प्रस्ताव (Hashim Ansari Committee, Dinesh Goswami Committee, NCRWC, Halim Committee), तुलनात्मक परिप्रेक्ष्य।
यह फ़ाइल Tenth Schedule के प्रावधानों, 1985 + 2003 के संशोधनों, क्रियान्वयन से जुड़ी समस्याओं, प्रमुख मामलों (Kihoto Hollohan, Subhash Desai 2023), और सुधार प्रस्तावों को कवर करती है।
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